Neeraj Chopra’s Historic Throw Paris Olympics 2024 Case Study Dr Vivek Bindra

पानीपत के पानी में कोई ऐसी खास बात है कि पानीपत के मोगली ने कायम करी पेरिस में एक नई मिसाल इंडियाज गोल्डन बॉय नीरज चोपड़ा को दूसरी बार ओलंपिक की जीत में हार्दिक शुभकामनाएं हाथ जोड़ के इनके जैवलिन का निशाना एक बार फिर जीत पर जाकर के लगा नमस्कार मैं डॉक्टर विवेक बिंद्रा फाउंडर एंड सीईओ bab.com बिजनेस मतलब बड़ा बिजनेस आज इस पानीपत की मोगली से आपको बिजनेस लेसेंस भी सिखाऊंगा और जीवन के लेसंस भी सिखाऊंगा आज बताऊंगा अपने भाले से भारत का नाम रोशन करने वाले नीरज चोपड़ा की लाइफ जर्नी पहले एशियन थे जिन्होंने ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीता वर्ल्ड चैंपियनशिप गोल्ड मेडल जैवलिन के अंदर इंडियाज ओनली ओलंपिक चैंपियन इन ट्रैक एंड फील्ड मेजर ध्यानचंद खेल रत्न अवार्ड पद्मश्री अवॉर्डी और जब इनका इंटरव्यू हुआ पिछली दफा 4 साल पहले हिंदी में बात करने लगे लोगों ने पूछा अंग्रेजी नहीं आती है आपको बोले आती है लेकिन जिनकी वजह से यहां पहुंचा हूं ना अगर उनको मेरी जीत की खुशी समझ में नहीं आई तो क्या फायदा ऐसी जीत का आई वुड लाइक टू आस्क यू अ क्वेश्चन दैट एट टाइम्स यू वड वी गेट फ्रस्ट्रेटेड बिकॉज़ ऑफ दैट देर हिंदी आती है आपको जी सर हिंदी में पूछ लो यार इतने देसी आदमी है अपने आसपास के लोगों को इतना प्यार करते हैं मुझे बस एक भाषा आती है अपनों की भाषा शुरुआत करते हैं 24 दिसंबर 1997 पानीपत के हरियाणा में खांडा गांव में एक जॉइंट फैमिली में इनका जन्म हुआ 10 भाई बहनों में नीरज सबसे बड़े बचपन से इनको ना क्योंकि सबसे बड़े थे तो शुरुआत का खूब दूध घी मलाई इन्हीं को खिलाया गया क्योंकि शुरुआत हीं से हुई थी बाकी बच्चे पीछे आ रहे थे नतीजा ये हुआ 11 साल की उम्र में आते-आते 80 किलो के हो गए फूल गए थोड़ा और इतना फूल गए कि खेलने जाते तो 11 साल की उम्र में 80 किलो बहुत ज्यादा होता है बच्चे सारे जो इनको कभी बोले बुरा नहीं मानिए मोटा हाथी गेंडा और क्या-क्या बोल के न को चिढ़ाते ो उनके साथ खेलते खेलता नहीं था तो 11 साल की उम्र में ये डिप्रेशन में चले गए और डिप्रेशन से बाहर निकालने के लिए इनके चाचा बड़े प्यारे थे इनको क्रिकेट फुटबॉल खिलाने के लिए पानीपत के स्टेडियम ले गए चाचा को था मैं इसको इसको ना खेलकूद से बाहर निकालू ा डिप्रेशन से उन्होंने सोचा थोड़ा भागेगा वजन भी कम हो जाएगा अब वहां कुछ बच्चों को उन्होंने जेवलिन थ्रो करते देखा चाचा को कहा कि भाई मैं भी यही खेलना चाहता हूं पहली नजर में मन को भाला भा गया हां चाचा ने मना कर दिया अच्छा इनका एक कारण था इनका कारण था चाचा सोच रहे थे कि जैवलिन थ्रो में भाई भागने वागने का चक्कर नहीं है स्कोप कम है तो इसका वजन कम नहीं होगा और चाचा को खेल की जानकारी नहीं थी उनको भाला फेंकने का गेम ही समझ में नहीं आया और डिप्रेशन से परेशान नीरज जानते थे कि ये वो गेम है जो अकेले खेला जा सकता है कोई मुझे मोटा गेंडा नहीं बोलेगा कोई मुझे छेड़े का तंग करेगा नहीं क्योंकि फुटबॉल क्रिकेट में सबके साथ खेलना है नी अड़ गए बोले खेलूंगा तो यही खेलूंगा अब तो ल भाला फेंकू चाचा ने हार मान ली बोले जविन थो के कोच को बोला नीरज को खेलने दो कोई बात नहीं खेलने दो उसको अब इसको फेंकने दो भाला हालांकि समझ में नहीं आया कि क्या होता है भाला कोच ने मौका तो दिया पर नीरज इतने मोटे थे कि जवले उठा ही नहीं पाए कोच ने कहा छ महीने बाद आना बेटा थोड़ा वजन कम करके आओ 80 को 40 करके लाओ उसके बाद भाला उठाना उन्होंने कोच से एक हफ्ते का समय मांगा पूरा 6 महीना नहीं एक हफ्ता 26 हफ्ते नहीं एक हफ्ता घर वापस जाकर के प्रैक्टिस के लिए जैवलिन खरीदने की कोशिश करी पिताजी को चाचा जी को चाची जी को माता जी को सबको रिक्वेस्ट किया कि जैवलिन आ रहा 000 का अब डंडा 000 किसी को समझ में ना आया चाचा ने सोचा दो चार दिन में भूत उतर जाएगा उसके बाद यह भाला बेकार हो जाएगा नीरज जब उन्होंने मना कर दिया ठीक है घर से ठीक थे पर फिर भी 000 भाले के लिए है जी क्या करेंगे तो लेकिन नीरज निराश नहीं हुए नीरज ने कहा कोई बात नहीं अगले दिन सुबह उठे गांव चले गए गांव में जाकर के लकड़ी डंडे ढूंढने लगे अलग-अलग डंडे ढूंढने लगे उसमें एक डंडा मिला उनको उसके आगे खुरपी लगा दी भारी डंडा बढ़िया खुरपी उठा के जैवलिन का जुगाड़ तैयार किया और फेंकना शुरू किया रात दिन प्रैक्टिस रात दिन प्रैक्टिस रात दिन प्रैक्टिस रात दिन प्रैक्टिस एक हफ्ते के बाद स्टेडियम पहुंच गए बोले कोट साहब एक मौका दे दो बस कोट साहब ने कहा पकड़ो दो इन्होंने जब भाला फेंका तो वहां जितने बढ़िया से बढ़िया फेंकने वाले थे उन सबको पार कर गए है 26 हफ्ते नहीं एक हफ्ता और कैसे गांव की लकड़ी प डंडे प खुरपी जोड़ के ये देख के कोच बहुत खुश हुए हैरान भी हो गए उन्होंने एडमिशन दे दिया उन्होंने कहा तू आज जा भाई आज जा अब नीरज का एडमिशन हो गया इतना अच्छा खेलने लगे कि कोच ने बोला कि अब तुम अपना भाला खरीदो मालूम चला भाला 000 का आ रहा है जो भाला स्टेडियम लेवल का है 000 का है घर की हालत ठीक थी लेकिन फिर मैं वही बता रहा हूं इतनी ठीक नहीं थी कि 10 बच्चों में एक बच्चे प इतना पैसा खर्च कर दे तो माता-पिता के लिए कठिन फैसला था कि महंगा भला दिलाए या नहीं दिलाए बैट बॉल होता दिला भी देते बाकी नौ बच्चों के भी काम आ जाता लेकिन नीरज के अंदर जब सीखने की इच्छा देखी और डिटरमिनेशन भयंकर तो पैसों का जुगाड़ करना शुरू किया उन्होंने तीन दिन तक पिताजी गांव में अपने दोस्तों से मिलते रहे भाई कुछ थोड़ा उधार मिल जाए उधार मिल जाए उधार मिल जाए उधार मिल जाए बेटा बहुत अच्छा खेलता है बहुत आगे जाएगा बहुत आगे जाएगा गया भी आगे लेकिन उस समय किसी को ये गेम समझ में नहीं आ रहा था वहां के लोग क्रिकेट के अलावा कुछ जानते नहीं थे या कुश्ती कुश्ती कर लेते हरियाणा के हैं तो कुश्ती कर लेंगे तरह-तरह की अब भाले प बल्ला भारी पड़ रहा था भाई बल्ला दिला दो भाला रहने दो लेकिन जब कुछ नहीं हुआ तो पिता ने अपनी साइकिल बेच दी जेब के आगे जुनून को हारने नहीं दिया जुनून को जिताया जेब को हराया साथ में घर का एक सोफा भी बेच दिया साइकिल से कितने पैसे आते जब सोफा साइकिल दोनों बेचे 15000 इकट्ठे हुए और मेरठ ले गए और मेरठ बिठा के ले गए वहां जाकर के बिल्कुल वहां जाके नेशनल लेवल पर जो स्टेडियम में यूज होने वाला जैबलिन है ना सबसे अच्छी क्वालिटी का लेके आया पूरे रास्ते नीरज चिपका के रखे जैबलिन को यूं छाती से चिपका कर के रात को आक के सोए सुबह उठते ही स्टेडियम पहुंच के दोपहर तक थ्रो पे थ्रो थ्रो पे थ्रो ना खाना ना पीना ना कोई ब्रेक ना थ्रो पे थ्रो थ्रो पे थ्रो उनकी उम्र के औसत बच्चे जो होते थे वो हफ्ते में तीन दिन प्रैक्टिस पे आते थे या तो मंडे वेनसडे फ्राइडे या ट्यूसडे थर्सडे सैटरडे और दो घंटा प्रैक्टिस करते थे यानी कि टोटल हफ्ते में छह घंटा और नीरज एक ही दिन में छ घंटा करते थे इनका एक ही तीन ही काम थे टोटल एक तो नहीं बोलूंगा तीन काम थे स्कूल जलिन रेस्ट स्कूल जैवलिन रेस्ट स्कूल जैवलिन रेस्ट स्कूल जैवलिन रेस्ट सुबह स्कूल दिन भर जेवलिन रात को रेस्ट अब क्या हुआ 11 साल की उम्र में जब खेलना शुरू किया तो 12 साल की उम्र में सारे मैच जीतने लग गए 13 साल की उम्र में डिस्ट्रिक्ट चैंपियन फिर स्टेट चैंपियन होने लगे आगे की ट्रेनिंग के लिए उनको पंचकुला जाना था पर पंचकुला की अकेडमी में कोई स्पेशलाइज कोच नहीं था अे घंटो तो खुद ही प्रैक्टिस करते लेकिन टेक्नीक चाहिए थी और टेक्नीक वाला कोच नहीं था कोई तो उन्होंने कहा यार दिमाग लगाते हैं भाबे के अंदर नौकरी करी बर्तन धोना खाना परोस तीन महीने तक खूब नौकरी करने के बाद थोड़े पैसे इकट्ठे किए सस्ता मोबाइल खरीद लिया और फिर तो youtube1 चैंपियन थे चेक एक कंट्री चेक स्लोवाकिया उसके जो चैंपियन थे हां जैन जलें जीी उसके वीडियोस देखने शुरू किए उसकी टेक्निक उसके हाथ उसके एंगल उसका फोकस उसके फुट स्टेप उसकी स्पीड उसका थ्रो और कैसे जाता है और कैसे रुकता है और कैसे फेंकता है एक ही वीडियो को बार बार बार बार बार बार देखते र स्टाइल को करने की कोशिश करते थे साथ में डायरी रखते थे पूरे नोट्स बनाते थे स्ट्रेटेजी टेक्नीक इंप्रूवमेंट एरिया सब कुछ देखते रहे कोई एक्सपेंसिव इक्विपमेंट नहीं कोई फॉर्मल ट्रेनिंग नहीं कोई फॉर्मल ट्रेनिंग नहीं मोबाइल में देख के सीख गए पर भाई लोगों एक बात बता देता हूं फॉर्मल ट्रेनिंग और youtube3 प्रेन्योर्स को इंप्लीमेंटेबल स्ट्रेटेजी देता हूं ताकि उनका विजनरी लीडरशिप स्किल कैसे बे बिल्ड हो जाए प्रोडक्ट इनोवेशन कैसे आए रेवेन्यू ग्रोथ स्ट्रेटेजी क्या है पांच होती है रेवेन्यू ग्रोथ स्ट्रेटेजी हाई परफॉर्मेंस टीम कैसे तैयार कर दूं मैं मार्केटिंग में अपनी विजिबिलिटी बिना पैसा खर्च करे कैसे बढ़ा दूं ग्लोबल एक्सपेंशन मेथोड क्या है प्रॉफिट मार्जिन को कैसे मैनेज किया जाए पूरे एक साल हैंड होल्डिंग होती है नीरज के पास फॉर्मल ट्रेनिंग नहीं थी लेकिन आपके पास है ताकि हर बिजनेस का हर नीरज चोपड़ा बिजनेस का र चोपड़ा उसके सपने तो पूरे हो जाए आगे चलते हैं चौथी कहानी टोक्यो ओलंपिक्स की टोक्यो ओलंपिक्स के लिए क्वालिफिकेशन राउंड शुरू हुआ उसी वक्त नीरज के एल्बो में ट्रेनिंग करते वक्त एक मेजर इंजरी हो गई एल्बो के बल पर गिर गए थे सर्जरी करानी पड़ी और जब सर्जरी हुई तो एल्बो से बोनस के टूटे हुए टुकड़े निकालने पड़े एल्बो के बोनस के टूटे हुए टुकड़े करियर थ्रेटनिंग जर्नी थी सबको पता था कि अ वापस नहीं खेल पाएंगे अपने थ्रोइंग आर्म से जिस आम से ते थे उससे चम्मच नहीं उठा सकते थे जेवलिन उठाना तो बहुत दूर की बात थी चम्मच समझते हो चम्मच कटोरी प्लेट में खाते हैं उसको उठाना मुश्किल था जैवलिन कहां से उठाए कई महीनों तक इनको ट्रेनिंग से दूर रहने को कहा गया अस्पताल में रहने को कहा गया उ उनको लगा ऐसे लेटा रहा ना तो जिंदगी में कभी नहीं खेल पाऊंगा उन्होंने क्या किया उन्होंने माइकल फेल्प्स वाला फार्मूला अपनाया हार नहीं मानी सर्जरी के तुरंत बाद बोले इसको छोड़कर बाकी बॉडी पार्ट की ट्रेनिंग तो कर लू सारे लोग इसी की ट्रेनिंग करते हैं कि इससे फेंकू कैसे मैं बाकी बॉडी पार्ट को पहले जब तक ये ठीक नहीं होता उसको शरीर में जंग नहीं लगने दूंगा आठ महीनों के बाद जनवरी 2020 कोविड से जस्ट पहले इंटरनेशनल कंपटीशन में भाई कोविड में ये करो ये खाओ ये पियो कई लोग तो कह रहे थे कि कोविड में शराब पीने से कोविड के कीटाणु मर जाते हैं यह वो सब करने की जगह पहले से भी ज्यादा ट्रेनिंग करने लगे पहले से ज्यादा मेहनत कर इंटरनेशनल लेवल की ट्रेनिंग को इन्होंने सरपास कर लिया सुपर सीड कर लिया अगत में पहुंच गए ओलंपिक्स में पार्ट लेने के लिए टोक्यो चले गए टोक्यो में क्वालीफाइंग राउंड से पहले ही उन्होंने टॉप परफॉर्मेंस दे दी थी इंडिकेशन हो गया था पूत के पांव पालने में दिखने लग गए थे और ऐतिहासिक 7 अगस्त 2020 को 87.5 मीटर का वो भाला फेंका इंडिया को पहला गोल्ड मेडल दिलाया पूरा भारत खड़ा हुआ था वो 7 अगस्त को आज नेशनल जैवलिन डे माना जाता है 13 साल की उम्र में डिस्ट्रिक्ट कंपटीशन में ब्रोंज मेडल जीतने से लेकर के 23 साल की उम्र में इंडिया को पहला ओलंपिक गोल्ड मेडल दिलाने तक और वो भी भारत भारत के नहीं एशिया के पहले थे इंडियाज गोल्डन बॉय इंस्पिरेशन टू थाउजेंड्स ऑफ यंग एथलीट इन द कंट्री नीरज चोपड़ा लर्निंग जब जोरदार हो तो लक्ष्य तक पहुंचना आसान हो जाता है और आपकी लर्निंग बहुत जोरदार थी अपनी स्टोरी से मैं आपकी लर्निंग्स के ऐसे ही लेवल अप करता रहूंगा और आपको ऐसे ही सिखाता रहूंगा आप भले ही मेरे पेड प्रोग्राम लीडरशिप फनल में ना आए लेकिन फ्री वीडियोस तो कम से कम देखते रहे पूरे भारत को दिखाए और अगर थोड़ा सा भी हिम्मत करके लीडरशिप फ में आ गए तो गेम उड़ाना मेरा काम है क्योंकि बिजनेस का मतलब बड़ा बिजनेस हमारे साथ जुड़े रहने के लिए वर्ल्ड के नंबर वन तपन [संगीत]

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